जुदाई देने वाले तुमसे उम्मीद-ए-वफा कैसी
ताल्लुक़ टूट जाये जब
मोहब्बत रुठ जाये जब
तो फिर रस्म-ए-दुआ कैसी
मिलन की इल्तिज़ा कैसी भवर मे डोलती कश्ती पे साहिल की तम्मना क्या
उखडती साँस हो तो ज़िन्दगी की आरज़ू भी क्या
जो मन्ज़िल खो चुकी उसकी फिर से जुस्तजू भी क्यो
मगर दिल ने तुम्हे किस वासते से याद रखा है
अभी तक मैने क्यो खुदको बहुत बर्बाद रखा है
हवा के दोश पर क्यो नगमा-ए-फरियाद रखा है
जुदाई देनेवाले अशनायी की कसम तुमको
तुम्हारी बेवफाई काज अदायी की कसम तुमको
मुझे इतना बता देना
वफा की चाहतो की मशाले कैसे बुझाते है
निशान कैसे मिटाते है
भुलना हो जिन्हे उनको भला कैसे भुलाते है |