मोहब्बत के नाम पे दिल पर गहरी चोट खायी है
मरहम के इन्तेज़ार मे घाव पे रंझ भी भर आयी है
कस्मे-वादो का कोई मोल नही इस जहाँ मे आज समझ मे आया
जिनसे उम्मीद की थी वफा की उनसे ही आज हमने बेवफाई पायी है
कर तो मै भी सकता हूँ अपना गम-ए-ब्यान उनसे
पर मै वादो का पक्का, सदा चेहरे पे
मुस्कुराते ही आयी है
भुलाने अब उनको मै भी चला हूँ मेहखाने की तरफ
पीटा तो नही मै पर फिर भी आंखे शबब से भर आयी है
बे-रुखसत उनकी चाहत से कुछ इस कदर हो गया हूँ मै
जैसे मेरे शरीर से जुदा होकर बहार मेरी रूह निकल आयी है
सोचा था एक तू ही तो मेरा सहारा थी जीने का
और तुने ही आज हमारी मोहब्बत की चित्ता जलायी है |