हो जाये कोई खता अगर तो रुसवा ना करना
गुनाहगार है ये दिल जो मचलने को है
इस शाम के पहलू मे आकर मिट जाने दो ये फासले
ना तरपाओ अब इतना भी तुम के ये शाम भी अब ढलने को है
कब से इन्तेज़ार मे नज़रे बिछाये बैठी हूँ मै
यूँ दूर से ही ना शरारत करो के अब ये जान निकलने को है
है बेहकी बेहकी हालत हमारी
बेहके बेहके इरादे है ज़रा आँचल तो सम्भाल
जाने दो ये क़दम अब फिसलने को है
इज़्हारे मोहब्बत हम कर ना सके चुप रहने की आदत हमारी थी
इस खामोशी को अब टुटने दो ये लब भी हमारे सिलने को है
परवाने की तलब मे शमा को तो जलते देखा था
लो इस बेज़ुबान मोहब्बत मे ये लोग भी आज जलने को है |