जिधर भी देखता हूँ तन्हाई नज़र आती है
आपके इन्तेज़ार मे हर शाम गुज़र जाती है
मै कैसे करू गिला दिल के ज़ख्मो से हुज़ूर
आंसू छलकते है मेरी सूरत निखर जाती है
तोड दिये है मैने अपने घर के सारे आईने
मेरी रूह मेरा ही चेहरा देख के डर जाती है
रोके हल्के हो लेते है ज़रा से तेरी याद मे
ज़रा सी ना-मुरादो की तबियत सुधर जाती है
असर करती यकीनन गर छू जाती उनके दिल को लेकिन
अफसोस के आह मेरी फिज़ाओ ही मे बिखर जाती है
मैकदे मे जब भी ज़िक्र आता है तेरे नाम का
शाम की पी हुई सर-ए-शाम उतर जाती है
कभी आके मेरे ज़ख्मो से मुक़ाबला तो कर
ए खुशी तू मूह मोड के किधर जाती है
तुझे इन्ही कांटो पे चल के जाना होगा
उनके घर को पास यही एक रहगुज़र जाती है |