हर रब्त एक नये क़र्ब से गुज़रता हूँ
गिर के सम्भलता हूँ सम्भल के गिरता हूँ
वो खुश नसीब है जो अपनी मौत मरते है
येहान ये हाल है ना जीता हूँ ना मरता हूँ
ये भी मानता हूँ के मै उस से प्यार करता हूँ
क्यो मुझ मे है मेहरूमी जो किसी मे नही
क्यो मै दूसरो की खुशियो से जलता हूँ
क्यो मै करके अफसोस नकामी पर
क्यो क़िस्मत का कहाँ कह के हाथ मलता हूँ
ये क्यो ही क्यो है मेरी ज़िन्दगी पर हावी
आखिर मै क्यो इस क्यो को क्यो समझता हूं
मै जीना चाहता हूं दूसरो की तरह
मै जानता हूं के मै जी भी सकता हूँ
गर्ज़ इस बात से है कमज़ोरी मेरे दिल की
दिल की बात दिल से करते हुए डरता हूँ
ये अजब बात नही माया कहे लौचे की तरह
एहसासे कमतरी से आज भी मै लडता हूं |