कि अब तो देश मेरा पराया सा लगता है...
थी बाज़ुओ मे जिसकी ताकत..
वो अब मुरझाया सा लगता है..
होसले हम मे भी है...
होसले तुम मे भी है..
तो क्यों पाक का इस ज़मीन पे साया अब तक मिलता है..
मिला लो अब तो दोस्त हाथो से हाथ..
कि अब तो अपना ही खून दिल जलाता है..
पूछती है वतन की मिटटी तन्हाईयो मे..
कि क्यों तुझे ज़मीन पर खौफ का साया लगता है..
या तो तू नही काबिल किसी मिटटी के..
या तू ही मौत का मारा लगता है..
कशमीर की वो बात करते है..
जो ताज़ हमारा है...
कि खून की होली खेलो चाहे या बनो गांधी के बन्दर..
हमे तो अपना वतन सम्भालना है..
तुम तो या ना हो तो भी क्या...
मिटटी से पैदा हुए, हमे मिटटी मे मिल जाना है.. |