माना हर दर्द-ए-दवा इतनी असरदार भी नही
मर जाये बिन तेरे ऐसे तो बीमार भी नही
दिल हो बेजान-ओ-जुमबिशे-ज़बन बेमयासर
तो फिर किस मुँह से कहिये की तक़ते गुफतर भी नही
सुना है शहर मे चर्चा-ए-साहिल भी अब नही होता
नज़रबंद-ए-गम ही सही मगर बेकार भी नही
वो ज़ख्मकारी का हुनर रखते है ए खुदा
हालत-ए-बेकसी कई चारसाज़ी-ए-असार भी नही
किस किस की खू डालियेगा ए दिल-ए-नादान
बेवफाई-ओ-बेनायज़ी-ओ-फिर शर्मसार भी नही
पायेंगे गमख्वारी-ए-गम-ए-दिल से भला क्या फैज़
रहा ही ना आईना तो दरार भी नही
क्यो किया और क्या करेगा साथ मेरे वो खुदा
पकडू जो नब्ज़ उसकी ऐसा तो होशियार भी नही
कर ली जो तन्हाई से तौबा तो वहाँ के हो लिये
देखा तो यहाँ भी संग-ए-साहिल एक मज़ार भी नही |