ये ज़िन्दगी इतनी अजनबी क्यो है,
किसी पल खुशी तो दुसरे पल नमी क्यो है,
खुश हो जाऊ मै किस बात पर,
किस बात पर गम मे सिमट जाऊ,
ना जाने मुझे इतनी बेकसी क्यो है,
बनाता हूं पानी पर निशान बार-बार
ये लकीरे बनकर मिट जाती क्यो है,
कोई लम्हा थामने की ख्वाहिश तो है,
पर ये घडी हमेशा चलती क्यो है,
परछाईयो के पीछे भागते है कदम,
फिर सोचते है ये परछाईयाँ बनती क्यो है,
सब कुछ तो है पास फिर कमी लगती क्यो है,
जिसके लिये चले हम तन्हा-तन्हा,
आज वो मन्ज़िल इतनी उदास सी क्यो है,
एक पल तो लगता है मिल गया सब कुछ मुझे,
दूसरे ही पल लगता है एक तलाश सी क्यो है,
चाहत तो है मुझे इस ज़िन्दगी से बहुत,
फिर ना जाने कुछ शिकायत सी क्यो है. |