मेरे शहरो को किसकी नज़र लग गयी,
मेरी गलियो की रोनक़ कहाँ खो गयी,
रोशनी बुझ गयी, आग ही सो गयी,
हम तो निकले थे हाथो मे सुरज लिये,
रात क्यो हो गयी?
हमसे क्यो रोशनी ने ये पर्दा किया,
क्यो अंधेरो ने रास्तो पे साया किया,
आओ सोचे ज़रा,
हम भी सोचे ज़रा, तुम भी सोचो ज़रा,
आग ही से पारे, रोशनी के बिना,
जितने इम्काम है सारे मर जायेंगे,
जो भी तखलीक़ है वो बिखर जायेगी,
तालिबान-ए-शहर! आओ सोचे ज़रा, आओ देखे ज़रा,
आरज़ू के सितारो से दमका हुआ,
परचम-ए-रोशनी किस तरह फट गया,
कौन सा मोड हमसे गलत कट गया,
फूल रुत मे खज़ा किस तरह छाँ गयी,
बीज क्या बो गयी,
हम तो निकले थे हाथो मे सुरज लिये,
रात क्यो हो गयी. |